Latest Posts & Updates
Fresh stories, announcements and offers about Lawyer, Law firm, Legal services, straight from our business.
बाद में विवाह का वादा टूटना शुरुआत से बेईमान इरादे के अभाव में धोखाधड़ी नहीं माना जा सकताः उड़ीसा…
बाद में विवाह का वादा टूटना शुरुआत से बेईमान इरादे के अभाव में धोखाधड़ी नहीं माना जा सकताः उड़ीसा उच्च न्यायालय केस का शीर्षकः एल.एस. बनाम उड़ीसा राज्य केस नंबरः 2009 का सीआरएलए नंबर 393 उडीसा उच्च न्यायालय का यह निर्णय विवाह के वादों से संबंधित आपराधिक कानून के एक महत्वपूर्ण पहलू को स्पष्ट करता है। यह स्थापित करता है कि अदालतों को सावधानीपर्वक जांच करनी चाहिए कि क्या वादा शुरू से ही झूठा था और धोखाधड़ी के डरादे से किया गया था। यह निर्णय केवल शादी के ट्टे वादों के आधार पर धोखाधड़ी के झूठे आरोपी व्यक्तियों को राहत प्रदान करता जिसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि शुरू से ही इरादा धारा 417 आईपीसी के तहत अपराध स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण तत्व है। #viralpost #legalnews #advrohitkumarmachawal #jaipurdiaries #trendingnow
धारा 92 BNS
गैर डरादतन हत्या की श्रेणी में आने वाले कत्य से अजन्मे बच्चे की तत्काल मृत्यु हों जाना। जो कोर्ड ऐसी परिस्थितियों में कोई कार्य करता है, कि यदि उसने मृत्यु कारित की तो वह गैर इरादतन हत्या का दोषी होगा, और ऐसे कार्य से किसी अजन्मे बच्चे की मृत्यु कारित करता है, तो उसे दस वर्ष तक की अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी, और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा। चित्रण। ए, यह जानते हुए कि उससे एक गर्भवती महिला की मृत्यु होने की संभावना है, ऐसा कार्य करता है, जिससे यदि महिला की मत्यु होती, तो वह गैर इरादतन हत्या की श्रेणी में आता। स्त्री घायल तो होती है, पर मरती नहीं; लेकिन इससे उसके गर्भ में पल रहे एक अजन्मे बच्चे की मृत्युहो जाती है। ए इस धारा में परिभाषित अपराध का दोषी है।
BNSकी
धारा 144 पत्नी, बच्चों और माता- -पिता के भरण पोषण - (Maintenance) से संबंधित है। यदि कोई सक्षम व्यक्ति अपने आश्रित परिवारजनों का भेरण-पोषण करने से इंकार करताहै या उनकी उपेक्षा करता है,तो प्रथम श्रेणी का न्यायिक मजिस्ट्रे उसे मासिक भरण-पोषण राशि देने का आदेश द सकता है।
तलाक कोई आसान रास्ता नहीं होता। यह न्यायालय में कई चरणों से होकर गुजरता है। जानिए कैसे:
1️⃣ फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल होती है पति या पत्नी कोर्ट में तलाक की याचिका लगाते हैं। यह याचिका या तो आपसी सहमति से या किसी विवादित आधार पर होती है – जैसे क्रूरता, परित्याग, या विवाहेतर संबंध। 2️⃣ नोटिस और जवाब कोर्ट दूसरा पक्ष बुलाता है। दूसरा पक्ष अपनी लिखित आपत्ति या जवाब दाखिल करता है। 3️⃣ साक्ष्य और जिरह दोनों ओर से गवाह और दस्तावेजी सबूत पेश होते हैं। वकील जिरह करते हैं। यही प्रक्रिया सबसे ज्यादा समय लेती है। 4️⃣ मध्यस्थता का प्रयास फैमिली कोर्ट कई बार दोनों पक्षों को सुलह के लिए काउंसलिंग या मध्यस्थता का मौका देती है। अगर कोई समझौता नहीं होता, तो केस आगे बढ़ता है। 5️⃣ फैमिली कोर्ट का निर्णय (डिक्री ऑफ डिवोर्स) सारे सबूत और दलीलें सुनने के बाद फैमिली कोर्ट फैसला सुनाता है। तलाक की डिक्री जारी की जाती है। 6️⃣ हाईकोर्ट में अपील अगर कोई पक्ष फैसले से असंतुष्ट हो, तो हाईकोर्ट में अपील कर सकता है। यह अपील आमतौर पर 90 दिन में दाखिल की जाती है। हाईकोर्ट पूरे मामले की वैधानिक समीक्षा करता है। 7️⃣ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अंतिम उपाय सुप्रीम कोर्ट होता है। यहाँ Special Leave Petition (SLP) दाखिल की जाती है। सुप्रीम कोर्ट तय करता है कि मामला सुनवाई योग्य है या नहीं। समझें –तलाक एक लंबी प्रक्रिया है जल्दबाज़ी में कोई कदम न उठाएँ। सही कानूनी सलाह लें। परिवार को समय और सम्मान दें। तलाक न सिर्फ क़ानूनी विषय है, बल्कि यह भावनात्मक और सामाजिक जिम्मेदारी भी है। समाज में इसके प्रति जागरूकता जरूरी है।
भरण पोषण (Maintenance)
Woman Rights
Judgment update for divorce
चेक बाउंस होने पर कानूनी कार्यवाही की प्रक्रिया (cheque Bounce Case Process)
आर्य समाज शादी (Arya Samaj Marriage) और कोर्ट मैरिज (Court Marriage) दोनों बिल्कुल अलग-अलग चीजें…
आर्य समाज शादी (Arya Samaj Marriage) और कोर्ट मैरिज (Court Marriage) दोनों बिल्कुल अलग-अलग चीजें हैं।** अक्सर लोगों को यह भ्रम होता है कि आर्य समाज में शादी कर ली तो कोर्ट मैरिज हो गई, लेकिन ऐसा नहीं है। दोनों में क्या मुख्य अंतर हैं, उन्हें आप इस तरह समझ सकते हैं: 1. आर्य समाज शादी (Arya Samaj Marriage) * **यह एक धार्मिक विवाह है:** यह पूरी तरह से वैदिक रीति-रिवाजों और अग्नि के फेरे लेकर संपन्न की जाने वाली धार्मिक शादी है। * **कानूनी मान्यता:** आर्य समाज मंदिर से मिलने वाला मैरिज सर्टिफिकेट इस बात का सबूत तो है कि आपकी शादी हुई है, लेकिन **यह पूरी तरह से कानूनी मैरिज सर्टिफिकेट नहीं माना जाता।** * **रजिस्ट्रेशन जरूरी है:** कानूनी तौर पर पूरी सुरक्षा पाने के लिए आर्य समाज में शादी करने के बाद भी आपको **हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act)** के तहत सब-रजिस्ट्रार (Tehsildar/Marriage Registrar) के ऑफिस जाकर अपनी शादी को रजिस्टर कराना पड़ता है। ### 2. कोर्ट मैरिज (Court Marriage) * **यह एक कानूनी प्रक्रिया है:** इसमें कोई धार्मिक रीति-रिवाज, फेरे या पंडित नहीं होते। यह सीधे कोर्ट में मैरिज ऑफिसर (DM/SDM) के सामने होती है। * **विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act, 1954):** यह शादी इसी कानून के तहत होती है। इसमें अलग-अलग धर्म या जाति के लोग भी बिना अपना धर्म बदले शादी कर सकते हैं। * **प्रक्रिया:** इसके लिए कोर्ट में पहले 30 दिन का नोटिस देना पड़ता है। उसके बाद गवाहों की मौजूदगी में मैरिज सर्टिफिकेट जारी होता है, जो अपने आप में ही अंतिम कानूनी दस्तावेज है। ### मुख्य अंतर (Quick Summary) | बात | आर्य समाज विवाह | कोर्ट मैरिज |